कल ही तो अखबार में पढ़ा था कि मशहूर लेखक कैलाश बाजपेयी को मुखाग्नि उनकी
बेटी अनन्या ने दी। और आज यह ख़बर कि माँ को मुखाग्नि देने के कारण भाई ने
बहन की हत्या कर दी। जबकि बहन गाँव में सरपंच थी। यह साहस करने और मौत से
गुज़र जाती स्त्रियों को सलाम करने का समय है। स्त्रियों के लिए यह बेहद
मुश्किल दौर है। … केवल स्त्रियों की जागृति और चेतना से समस्या हल नहीं
होगी ,चेतना और जागृति समाज की आवश्यकता हैं। जो हत्या करता है वह केवल एक
दिन में हत्यारा नहीं बनता उसकी मानसिक बुनावट सदियों पुरानी है। जिसका एक
भी धागा खोलने की कल्पना तक से लोग हिचकिचाते हैं। लोगों से बातचीत और निजी
स्तर पर हर एक की शुरुआत के साथ यह प्रशासन का भी मामला है। कोई डर नहीं
किसी को कानून का। सरेआम दिनदहाड़े कोई भी हत्या कर देता है ? कितना शर्मनाक
है !… उफ़्फ़ ! मरती रहेंगी औरतें जब तक धरती खाली न हो जाये या मारने वाले
थक न जाएं।
Saturday, April 18, 2015
- Richa Singh Sahi hai di... kai bar sach mein ye antar karna mushkil ho jata hai ki kaun aapki prashansha karna chah raha hai aur kaun aapko parensha karna chah raha hai. Sab kuch babut complex hota ja raha hai.
- Meera Gupta Han sahi hai kanchan lekin yeh samaj aur khastor se bhartiya samaj hamesha do chehare wala hai proressive bhi aur prampara se labalab bhi. Pragatisheel hona fashion hai aur conventional hona hamari sanskritic virasat. Donon mein koi talmale nahin hai.
- Kanchan Bhardwaj मैं उनकी तरफ देख रही हूँ जो सृजन और कला से सरोकार रखते हैं
जो नए फ्रेम रच देने की जिम्मेदारी से जूझते रहने का गर्व /दम्भ रखते हैं
लेकिन मारा जाता है वह जो परम्परा को निभाता है ...See More - Meera Gupta Srijan hamare desh main parampara ka hissa hai. Aur yahi baat hamain star to bana deti hai kalakar nahin.
लड़का लड़की से बात करना चाहता है!
तो कैसे करे ?
समाज में जो तरीके फिल्मों और
किताबों से सीखे वे तो आज के समाज में
पिटे हुए और भद्दे माने हैं !
फिर भी लड़का एक तरीका चुन लेता है
लड़की के सौंदर्य की प्रशंसा करने का अभ्यास करके आता है
उम्दा लफ़्फ़ाज़ी और बेहतरीन अदायगी की पुरजोर कोशिश करके
जैसे ही एक खूबसूरत मुस्कान की उम्मीद करता है कि
लड़की उसकी कलाई मोड़ती और
बेल्ट निकालकर पीटती नज़र आती है
जागरूक समाज की बहादुर पब्लिक
उस लड़की का साथ देने लगती है
पिटते -पिटते लड़का बेहोश हो जाता है
पुलिस और डॉक्टर के मुताबिक लड़के को जब भी होश आता है
वह एक ही बात बोलता है -
''तुम्हारा खूबसूरत चेहरा मेरी आँखों को बहुत हसीं लगता है ''।
उसके मरने पर
उसकी माँ की बोली गयी बात
कई बार टी.वी. पर दिखाई गयी-
'' वह पिछले कई दिनों से अक्सर पूछता था कि
माँ तुम्हे बहुत अच्छा लगता है न जब कोई
तुम्हे खूबसूरत कहता है ....
और मुन्ना कई बार कहता था फिर
''माँ तुम बहुत सुन्दर हो "…
फिर मैं आइने के सामने खड़ी होती ,
उससे नज़रें चुराकर मुस्कुराती और
वह फिर खूब हँसता था। .... ''
हंसी की बातें करती माँ
अपने मुन्ने को याद करके खूब जोर से रोने लगती।
मीडिया अब उस लड़की की तस्वीर
दिखाने में मशगूल हो जाता जो
अज़नबी से सुन्दरता की बात को
छेड़ना मानकर सबक सिखाती है।
बहसें गर्म हो रही थीं अपने -अपने अंदाज़ में ……
लड़की कहाँ से सुन्दर है ?
सुन्दर को सुन्दर कहने में क्या बुराई हो गयी ?
लड़की को सुन्दर क्यों नहीं होना चाहिए ?
पाँच से पचहत्तर उम्र की औरत भी
सुन्दर कहने से खुश हो जाती है
भला लड़के की जान ले ली
'सुंदरता' के मानदंड ने।
चूड़ी ,बिंदी,लिपिस्टिक ,क्रीम
न जाने कितने विज्ञापनों से
होर्डिंग्स और अख़बार भरे रहते हैं
साहित्य और कला की दुकानें
नखशिख रूप वर्णन से लकदक हैं
पहले 'ब्यूटी' था फिर
'ब्यूटी विद ब्रेन' हो गया
इतना काफी नहीं क्या ?
क्या सिर्फ़ * ब्रेन * लिख दें ?
तो सब सेल्फ़ी तस्वीरें हटाओ पहले
तो पहले रीतिकाल के सौंदर्य को निकालो मुख्यधारा से
तो तमाम हुस्न की शायरी पर मुक़दमा चलाओ
तो चित्रकार की कला क्या करेगी ?
भाषा पर जान लेने वालों ने
डेली वेळी का क्या कर लिया या
क्या कर लेंगे उस नए शो का
जिसमें सेलिब्रिटीज हदें पार कर रहे हैं
हद क्या है
कौन बताएगा
डॉक्टर का हुनर क्या इससे खूबसूरत होगा कि
लेडी डॉक्टर खुद कितनी खूबसूरत है ?
लेकिन अनुभवी कहते हैं कि
खूबसूरत लेडी डॉक्टर की दुकान ज्यादा चलती है !
खूबसूरत अध्यापिका पॉपुलर होती है
स्टाइलिश अध्यापक भी ....
क्या सचमुच … ???
पाँच साल की बच्ची से मुख़ातिब होते ही
उसकी ड्रेस और हेयर क्लिप की बात लोग शुरू कर देते हैं
बच्चे का ध्यान उधर जाने लगता है
जिन बातों का उसे माहौल दिया जाता है।
सब कुछ फ्रेम बनाकर सेट है
लड़का भी बने हुए फ्रेम में से एक चुन लेता है
और मारा जाता है
पचपन का आदमी भी रिकॉर्डिंग में इसी का शिकार बन गया
पचास की माँ भी रोती है बेटे को याद करके ....
बेल्ट वाली लड़की ने अपने फ्रेम
खुद रचने शुरू कर दिए हैं
चेतावनी !
बने बनाये परंपरा से चुने फ्रेम उठा लेने पर
जान जोखिम में पड़ सकती है
अब लड़कियाँ बेल्ट निकल लेती हैं
पब्लिक भी साथ दे देती है
कैमरा रिकॉर्डिंग कर लेता है
परम्परा कूड़े में डाली जा सकती है
लड़के जान नहीं गँवाना चाहते हैं
वे नई परम्परा में नई लड़कियों का साथ दे रहे हैं
छोटी बच्ची गाती है
नन्ही मुन्नी राही मैं भी
देश की सिपाही मैं भी !!
होर्डिंग्स पर चेहरे बदलने लगे
कभी मदर टेरेसा का चेहरा आता
तो कभी सुनीता विलियम्स का
तो कभी सेना की यूनिफार्म पहने परेड करती लड़की का।
उनका कर्म उनका सौंदर्य है।
अपनी नज़र का चश्मा नहीं नज़र बदलो
लड़कियाँ शर्मिंदा होने की जगह
बेल्ट और कैमरा निकल लेती हैं।
नज़रिया बदल रहा है
परम्परा नई बन रही है।
____________________________
KANCHAN
तो कैसे करे ?
समाज में जो तरीके फिल्मों और
किताबों से सीखे वे तो आज के समाज में
पिटे हुए और भद्दे माने हैं !
फिर भी लड़का एक तरीका चुन लेता है
लड़की के सौंदर्य की प्रशंसा करने का अभ्यास करके आता है
उम्दा लफ़्फ़ाज़ी और बेहतरीन अदायगी की पुरजोर कोशिश करके
जैसे ही एक खूबसूरत मुस्कान की उम्मीद करता है कि
लड़की उसकी कलाई मोड़ती और
बेल्ट निकालकर पीटती नज़र आती है
जागरूक समाज की बहादुर पब्लिक
उस लड़की का साथ देने लगती है
पिटते -पिटते लड़का बेहोश हो जाता है
पुलिस और डॉक्टर के मुताबिक लड़के को जब भी होश आता है
वह एक ही बात बोलता है -
''तुम्हारा खूबसूरत चेहरा मेरी आँखों को बहुत हसीं लगता है ''।
उसके मरने पर
उसकी माँ की बोली गयी बात
कई बार टी.वी. पर दिखाई गयी-
'' वह पिछले कई दिनों से अक्सर पूछता था कि
माँ तुम्हे बहुत अच्छा लगता है न जब कोई
तुम्हे खूबसूरत कहता है ....
और मुन्ना कई बार कहता था फिर
''माँ तुम बहुत सुन्दर हो "…
फिर मैं आइने के सामने खड़ी होती ,
उससे नज़रें चुराकर मुस्कुराती और
वह फिर खूब हँसता था। .... ''
हंसी की बातें करती माँ
अपने मुन्ने को याद करके खूब जोर से रोने लगती।
मीडिया अब उस लड़की की तस्वीर
दिखाने में मशगूल हो जाता जो
अज़नबी से सुन्दरता की बात को
छेड़ना मानकर सबक सिखाती है।
बहसें गर्म हो रही थीं अपने -अपने अंदाज़ में ……
लड़की कहाँ से सुन्दर है ?
सुन्दर को सुन्दर कहने में क्या बुराई हो गयी ?
लड़की को सुन्दर क्यों नहीं होना चाहिए ?
पाँच से पचहत्तर उम्र की औरत भी
सुन्दर कहने से खुश हो जाती है
भला लड़के की जान ले ली
'सुंदरता' के मानदंड ने।
चूड़ी ,बिंदी,लिपिस्टिक ,क्रीम
न जाने कितने विज्ञापनों से
होर्डिंग्स और अख़बार भरे रहते हैं
साहित्य और कला की दुकानें
नखशिख रूप वर्णन से लकदक हैं
पहले 'ब्यूटी' था फिर
'ब्यूटी विद ब्रेन' हो गया
इतना काफी नहीं क्या ?
क्या सिर्फ़ * ब्रेन * लिख दें ?
तो सब सेल्फ़ी तस्वीरें हटाओ पहले
तो पहले रीतिकाल के सौंदर्य को निकालो मुख्यधारा से
तो तमाम हुस्न की शायरी पर मुक़दमा चलाओ
तो चित्रकार की कला क्या करेगी ?
भाषा पर जान लेने वालों ने
डेली वेळी का क्या कर लिया या
क्या कर लेंगे उस नए शो का
जिसमें सेलिब्रिटीज हदें पार कर रहे हैं
हद क्या है
कौन बताएगा
डॉक्टर का हुनर क्या इससे खूबसूरत होगा कि
लेडी डॉक्टर खुद कितनी खूबसूरत है ?
लेकिन अनुभवी कहते हैं कि
खूबसूरत लेडी डॉक्टर की दुकान ज्यादा चलती है !
खूबसूरत अध्यापिका पॉपुलर होती है
स्टाइलिश अध्यापक भी ....
क्या सचमुच … ???
पाँच साल की बच्ची से मुख़ातिब होते ही
उसकी ड्रेस और हेयर क्लिप की बात लोग शुरू कर देते हैं
बच्चे का ध्यान उधर जाने लगता है
जिन बातों का उसे माहौल दिया जाता है।
सब कुछ फ्रेम बनाकर सेट है
लड़का भी बने हुए फ्रेम में से एक चुन लेता है
और मारा जाता है
पचपन का आदमी भी रिकॉर्डिंग में इसी का शिकार बन गया
पचास की माँ भी रोती है बेटे को याद करके ....
बेल्ट वाली लड़की ने अपने फ्रेम
खुद रचने शुरू कर दिए हैं
चेतावनी !
बने बनाये परंपरा से चुने फ्रेम उठा लेने पर
जान जोखिम में पड़ सकती है
अब लड़कियाँ बेल्ट निकल लेती हैं
पब्लिक भी साथ दे देती है
कैमरा रिकॉर्डिंग कर लेता है
परम्परा कूड़े में डाली जा सकती है
लड़के जान नहीं गँवाना चाहते हैं
वे नई परम्परा में नई लड़कियों का साथ दे रहे हैं
छोटी बच्ची गाती है
नन्ही मुन्नी राही मैं भी
देश की सिपाही मैं भी !!
होर्डिंग्स पर चेहरे बदलने लगे
कभी मदर टेरेसा का चेहरा आता
तो कभी सुनीता विलियम्स का
तो कभी सेना की यूनिफार्म पहने परेड करती लड़की का।
उनका कर्म उनका सौंदर्य है।
अपनी नज़र का चश्मा नहीं नज़र बदलो
लड़कियाँ शर्मिंदा होने की जगह
बेल्ट और कैमरा निकल लेती हैं।
नज़रिया बदल रहा है
परम्परा नई बन रही है।
____________________________
KANCHAN
इसी
समय में किसी दूसरे देश में लोग इस लड़ाई में कामयाब हो जाते हैं कि कॉफी
हाउस में भी अगर बच्चों का डाइपर बदलना हो तो उसके लिए डाइपर चेंजिंग
स्टेशन की सुविधा होनी चाहिए और यह न केवल फीमेल रेस्ट रूम में हो ,इसे
पुरुषों के रेस्ट रूम में भी होना चाहिए ,क्योंकि पिता भी अगर अकेले छोटे
बच्चे को लेकर बाहर आउटिंग पर गया हो तो उसे वाश बेसिन में बच्चे को टाँगे
टाँगे डाइपर न बदलना पड़े। और हमारे देश में वर्किंग लेडी इस गिल्ट में घुट
जाती है कि मेरे काम करने के कारण बच्चा कितना कुछ सहता है।
ईश्वर ने जिन बच्चों को पढ़े लिखे माँ बाप दिए, उन बच्चों की परवरिश एक
अनपढ़ नौकरानी करती है डस्टिंग के कपडे से नाक पोछते हुए। फिर इसे सही करते
हुए माँ अपनी नौकरी छोड़ देती है। क्योंकि सरकार की तरफ से कोई ध्यान नहीं।
और कॉरपोरेट के लोग ध्यान क्यों नहीं दे रहे कि आधी आबादी महिलाओं की काम
करेगी तो देश की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव होगा। यह मैं नहीं कह
रही बल्कि दूसरे देश की आर्थिक नीतियों में इसका ख्याल रहता है। दिल्ली
में ही एक ब्यूटी पार्लर है जो यह ख्याल रखता है कि अगर बच्चों वाली
महिलाएं आएँगी तो उन्हें कोई असुविधा नहीं होगी। छोटे बच्चों की देखभाल के
लिए वहाँ सुविधा है। लेकिन मैंने किसी लाइब्रेरी के साथ जुडी ऐसी सुविधा
नहीं देखी कि बच्चों वाली माँ जाये तो बाहर उसके छोटे बच्चों के लिए भी कुछ
देर के लिए कोई व्यवस्था हो। जबकि कुछ देशों में यह है। हमारे यहाँ
मातृत्व की गरिमा पाते ही सब टैलेंट ख़त्म ! नन्हा सा मासूम बच्चा अपनी माँ
का अपराधी हो गया। क्या सचमुच दोष बच्चे का है या मातृत्व का है या फिर
पिता दोषी हो गया या हमे अपने सिस्टम से मांग करनी चाहिए। यह टैबू से बाहर
आने का समय है ..... अपने और अपने मासूमों के अधिकार के लिए आवाज़ दीजिये
एक साथ। माँ /पिता बनना कोई अपराध है क्या कि आप घुटें या खुद को सजा दें
या बच्चा सजा भुगते।
अगर मैं अपने समय के असह्य काले धब्बों को
अपने चेहरे पर स्वीकार न करूँ ; तो
यह मेरे लिए आत्मघाती कदम होगा ?
या एक तरह से आत्महत्या का प्रयास !!
यक़ीनन कोई न कोई ,कहीं न कहीं से
मुझे मार डालने की योजना बना रहा होगा
मेरे मारे जाने की जगह कोई एक तय नहीं
यह कोई भी एक देश ,कोई एक शहर
यहां तक कि अपना घर भी हो सकता है।
सिर्फ़ मेरे विचारों के कारण
कोई भी मुझे ब्लॉक कर सकता है
मेरी सांसों को रोक सकता है
मेरे खुले मन की उन्मुक्त अस्वीकृति ही
मेरा आत्मघाती कदम है या आत्महत्या !
अपनी -अपनी किताबों के खूबसूरत कवर को
निहारे जाने का समय नहीं है अब ,
अगर लाल ख़ून ,नीली स्याही और काले समय को
चीन्हे जाने का समय नही है यह ?
तो क्या अपनी मृत्यु के जश्न का संगीत है यह
जो चारों ओर से एक गूँज बनकर मुझे ढक रहा है !
मैं अपने चेहरे की ख़ातिर
लहूलुहान हूँ
एक बेदाग आईने की तलाश में।
_____________________
अपने चेहरे पर स्वीकार न करूँ ; तो
यह मेरे लिए आत्मघाती कदम होगा ?
या एक तरह से आत्महत्या का प्रयास !!
यक़ीनन कोई न कोई ,कहीं न कहीं से
मुझे मार डालने की योजना बना रहा होगा
मेरे मारे जाने की जगह कोई एक तय नहीं
यह कोई भी एक देश ,कोई एक शहर
यहां तक कि अपना घर भी हो सकता है।
सिर्फ़ मेरे विचारों के कारण
कोई भी मुझे ब्लॉक कर सकता है
मेरी सांसों को रोक सकता है
मेरे खुले मन की उन्मुक्त अस्वीकृति ही
मेरा आत्मघाती कदम है या आत्महत्या !
अपनी -अपनी किताबों के खूबसूरत कवर को
निहारे जाने का समय नहीं है अब ,
अगर लाल ख़ून ,नीली स्याही और काले समय को
चीन्हे जाने का समय नही है यह ?
तो क्या अपनी मृत्यु के जश्न का संगीत है यह
जो चारों ओर से एक गूँज बनकर मुझे ढक रहा है !
मैं अपने चेहरे की ख़ातिर
लहूलुहान हूँ
एक बेदाग आईने की तलाश में।
_____________________
अगर मैं अपने समय के असह्य काले धब्बों को
अपने चेहरे पर स्वीकार न करूँ ; तो
यह मेरे लिए आत्मघाती कदम होगा ?
या एक तरह से आत्महत्या का प्रयास !!
यक़ीनन कोई न कोई ,कहीं न कहीं से
मुझे मार डालने की योजना बना रहा होगा
मेरे मारे जाने की जगह कोई एक तय नहीं
यह कोई भी एक देश ,कोई एक शहर
यहां तक कि अपना घर भी हो सकता है।
सिर्फ़ मेरे विचारों के कारण
कोई भी मुझे ब्लॉक कर सकता है
मेरी सांसों को रोक सकता है
मेरे खुले मन की उन्मुक्त अस्वीकृति ही
मेरा आत्मघाती कदम है या आत्महत्या !
अपनी -अपनी किताबों के खूबसूरत कवर को
निहारे जाने का समय नहीं है अब ,
अगर लाल ख़ून ,नीली स्याही और काले समय को
चीन्हे जाने का समय नही है यह ?
तो क्या अपनी मृत्यु के जश्न का संगीत है यह
जो चारों ओर से एक गूँज बनकर मुझे ढक रहा है !
मैं अपने चेहरे की ख़ातिर
लहूलुहान हूँ
एक बेदाग आईने की तलाश में।
_____________________
अपने चेहरे पर स्वीकार न करूँ ; तो
यह मेरे लिए आत्मघाती कदम होगा ?
या एक तरह से आत्महत्या का प्रयास !!
यक़ीनन कोई न कोई ,कहीं न कहीं से
मुझे मार डालने की योजना बना रहा होगा
मेरे मारे जाने की जगह कोई एक तय नहीं
यह कोई भी एक देश ,कोई एक शहर
यहां तक कि अपना घर भी हो सकता है।
सिर्फ़ मेरे विचारों के कारण
कोई भी मुझे ब्लॉक कर सकता है
मेरी सांसों को रोक सकता है
मेरे खुले मन की उन्मुक्त अस्वीकृति ही
मेरा आत्मघाती कदम है या आत्महत्या !
अपनी -अपनी किताबों के खूबसूरत कवर को
निहारे जाने का समय नहीं है अब ,
अगर लाल ख़ून ,नीली स्याही और काले समय को
चीन्हे जाने का समय नही है यह ?
तो क्या अपनी मृत्यु के जश्न का संगीत है यह
जो चारों ओर से एक गूँज बनकर मुझे ढक रहा है !
मैं अपने चेहरे की ख़ातिर
लहूलुहान हूँ
एक बेदाग आईने की तलाश में।
_____________________
लो चली मैं
अपने भाई की बारात लेकर। ....
भाई, जिसे आता है ज़िंदगी की आग में से भी जीवन बचा लेना।
उसने गार्टन कैसल,(शिमला) में लगी भयानक आग के मलबे से भी बचा लिए थें कीमती सरकारी कागज़ात
सरकार ने सम्मानित किया इसके लिए वीरता पुरस्कार से …
अपने भाई की बारात लेकर। ....
भाई, जिसे आता है ज़िंदगी की आग में से भी जीवन बचा लेना।
उसने गार्टन कैसल,(शिमला) में लगी भयानक आग के मलबे से भी बचा लिए थें कीमती सरकारी कागज़ात
सरकार ने सम्मानित किया इसके लिए वीरता पुरस्कार से …
भाई , जिसने इक्कीस बरस की उम्र में पापा के न होने से घर की जिम्मेदारियाँ निभायी
बड़ी बहन के ब्याह की जिम्मेदारी निभायी ,उसे ससुराल भेजा ,फिर
ससुराल में जब उसे मार दिया गया तो बहनोई को जेल भेजा और सजा दिलवाई …
भाई, जिसने माँ की ख़ातिर पहाड़ की नौकरी छोड़ दी क्योंकि
अस्थमा के कारण उन्हें पहाड़ पर दिक्कत रहती, और
अकेले वह उन्हें छोड़ना नहीं चाहता। ....
भाई ,जब नहीं था तब दस बरस की उम्र तक
राखी के दिन बाबा बनखण्डीनाथ के मंदिर के सामने दुआ करती थी
एक भाई देने के लिए। ....
अब उसी की बारात है तो इस बार किताब के मेले नहीं जा रही
बारात लेकर जाना है। …
बड़ी बहन के ब्याह की जिम्मेदारी निभायी ,उसे ससुराल भेजा ,फिर
ससुराल में जब उसे मार दिया गया तो बहनोई को जेल भेजा और सजा दिलवाई …
भाई, जिसने माँ की ख़ातिर पहाड़ की नौकरी छोड़ दी क्योंकि
अस्थमा के कारण उन्हें पहाड़ पर दिक्कत रहती, और
अकेले वह उन्हें छोड़ना नहीं चाहता। ....
भाई ,जब नहीं था तब दस बरस की उम्र तक
राखी के दिन बाबा बनखण्डीनाथ के मंदिर के सामने दुआ करती थी
एक भाई देने के लिए। ....
अब उसी की बारात है तो इस बार किताब के मेले नहीं जा रही
बारात लेकर जाना है। …
अगर मुझे अपने बच्चे के लिए किताब लिखनी है तो उसमें कुछ पाठ हटाने और कुछ नए जोड़ने होंगे। …
जैसे :- - वज़ीफ़े के लिए प्रार्थना- पत्र लिखना नहीं सिखाया जायेगा यह तो सरकार और समाज की जिम्मेदारी है बच्चा क्यों प्रार्थना करे ?
-विद्यालय में खेल का सामान नहीं है इसके मंगाने के लिए बच्चा क्यों प्रार्थना करे ? यह तो खेल शिक्षक और प्रिंसिपल की नैतिक जिम्मेदारी है कि फण्ड कहाँ गया ?
-अपनी बीमारी के लिए दो दिन के प्रार्थना पत्र की जगह अपनी माँ की बीमारी में सेवा के लिए अवकाश प्रार्थना -पत्र होगा
-मदर टेरेसा की तरह कोई ऐसा ही फादर नाम हो तो वह होगा जिसने मनुष्य की रोग सेवा तन से की हो ,कोई सुझाव दें।
जैसे :- - वज़ीफ़े के लिए प्रार्थना- पत्र लिखना नहीं सिखाया जायेगा यह तो सरकार और समाज की जिम्मेदारी है बच्चा क्यों प्रार्थना करे ?
-विद्यालय में खेल का सामान नहीं है इसके मंगाने के लिए बच्चा क्यों प्रार्थना करे ? यह तो खेल शिक्षक और प्रिंसिपल की नैतिक जिम्मेदारी है कि फण्ड कहाँ गया ?
-अपनी बीमारी के लिए दो दिन के प्रार्थना पत्र की जगह अपनी माँ की बीमारी में सेवा के लिए अवकाश प्रार्थना -पत्र होगा
-मदर टेरेसा की तरह कोई ऐसा ही फादर नाम हो तो वह होगा जिसने मनुष्य की रोग सेवा तन से की हो ,कोई सुझाव दें।
ऐसा ही और भी बहुत कुछ जोड़ने और घटाने के लिए ……
कुछ आप भी जोड़ें इसमें अपने बच्चे के लिए.…जो आप पुस्तक में जोड़ना और हटाना चाहते हों उनकी किताबों से। ....
कुछ आप भी जोड़ें इसमें अपने बच्चे के लिए.…जो आप पुस्तक में जोड़ना और हटाना चाहते हों उनकी किताबों से। ....
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